Tuesday, June 9, 2020

Kaagaz Ke Phool: वक़्त ने किया क्या हंसीं सितम

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Kaagaz Ke Phool 
शौहरत, दुनिया का आपका दीवाना होना कागज के फूल की तरह है, जो लगता तो खूबसूरत है, लेकिन असल फूल की तरह खुशबु नहीं देता, जिसके लिए वह पहचाना जाता है। कागज का फूल सिर्फ दिखने के लिए फूल होता है, असल में वह सिर्फ दिल बहलाने के लिए एक ख्याल होता है। कागज का फूल फिल्म भी कुछ ऐसी ही है। फिल्म शुरू होती है, जहाँ बूढ़े सुरेश सिन्हा (गुरु दत्त) अपनी फिल्म के सेट पर पहुँचते हैं, उसे बहुत ध्यान से देखते हैं कि कभी वो भी फिल्मों का डायरेक्शन किया करते थे। फैन्स उनके आगे पीछे घूमते थे, लेकिन जिंदगी इस मोड़ पर ले आई कि वो खाने-खाने को मोहताज हो गए। सुरेश एक कामयाब डायरेक्टर हैं, उनकी पत्नी उनसे अलग रह रही हैं क्योंकि वो फिल्मों में काम करने लग गए हैं। उनकी पत्नी वीना के नजरिये से फिल्मो का माहौल बहुत गंदा है। वीना अमीर घराने से हैं, उसने पिता से दूर रखने के लिए अपनी बच्ची पम्मी को दूर एक बोर्डिंग स्कूल में रखा है। इधर कभी-कभी छुप-छुप के सुरेश अपनी बेटी से मिल लेते हैं। बॉम्बे में वे अकेले रहते हैं। एक दिन वह देवदास की कहानी पर काम कर रहे होते हैं। अपनी फिल्म देवदास के लिए ऐसी हीरोइन चाहिए, जिसमें सादगी हो, जो बिना मेकअप के भी खूबसूरत लगती हो।

ऐसे कैसे जाने भी दो यारो!


सुरेश की मुलाकात शांति (वहीदा रहमान) से होती है। वह अपनी फिल्म में उसे कास्ट कर देते हैं। शांति सुरेश को चाहने लगती है। शांति और सुरेश एक दूसरे को समझने लग जाते हैं। जब अख़बारों में ये चर्चा होती हैं तो सुरेश की बेटी पम्मी शांति को मजबूर करती है कि वह उसके मां-बाप के बीच में से हट जाए। शांति उसे समझाती हैं कि उसके आने से पहले ही उसके मां-बाप अलग रह रहे है। पम्मी उसकी एक नहीं सुनती और उसे जाने के लिए कहती है। प्रोड्यूसर के साथ शांति का सात साल का कॉन्ट्रेक्ट रहता है। शांति सब छोड़ कर एक गांव में चली जाती है। इधर पम्मी के नाना उसे लेने आते हैं, लेकिन वह जाने को तैयार नहीं होती और न ही सुरेश उन्हें ऐसा करने देता है। नतीजन पम्मी के नाना कस्टडी के लिए केस लगा देते हैं, जिसमें सुरेश हार जाता है।
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वह अकेला रह रहा होता है लेकिन केस हार जाने के बाद उसे असल में अकेलापन तब महसूस होता है। इस अकेलेपन में वह टूट जाता है और शराब पीने लगता है। इस तरह उसका बना बनाया करियर खराब हो जाता है। इधर शांति प्रोड्यूसर के लगाए गए केस हारने के बाद दोबारा काम पर आने के लिए सुरेश को डायरेक्शन देने की बात कहती है। सुरेश शराब में इतना डूब जाता है कि शांति से कहता है कि उसने सब कुछ खो दिया अब खुद्दारी नहीं खोना है। वह काम नहीं करता और आखिरी पल में डायरेक्टर की कुर्सी पर बैठता है, और वहीं दम तोड़ देता है।
फिल्म की कहानी ठीक थी। गुरु दत्त की फिल्म शैली ऐसी रही है कि उनकी फिल्मों का विषय आज भी प्रासंगिक रहा हैं, साथ ही फिल्माने का अंदाज भी आधुनिक ही रहा है। फिल्म का स्क्रीनप्ले भी अच्छा है लेकिन फिल्म को थोड़ा ज्यादा खिंच दी। इसे दो घंटे का भी बनाया जा सकता था। कही पर भी किसी भी लिहाज से डायरेक्शन में कमी नहीं बाकी जॉनी वॉकर हंसाने के लिए हैं ही। 
कैमरा संभाला है वीके मूर्ति ने, उन्होंने हर सीन के मूड़ के साथ शूट परफेक्शन के साथ किया है। सेट और लोकेशन भी अच्छे है। संगीत ठीक है, सन सन वो चली हवा गाना फिल्म में सबसे अच्छा है। 
अभिनय की बात करें तो गुरु दत्त, वहीदा रहमान, जॉनी वॉकर, वीना सप्रू ने अच्छा अभिनय किया है। कुल मिलाकर फिल्म अच्छी है, थोड़ी सी ठंडी है और कुछ-कुछ जगह मकसद खोती है। फ्री है तो ये फिल्म देख सकते हैं लेकिन अलग से समय न निकालें। 

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