Friday, May 22, 2020

प्यासा: ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है?


साहिर लुधियानवी कहते हैं, ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है, ये महलों, ये तख़्तों, ये ताजों की दुनिया, ये इनसां के दुश्मन समाजों की दुनिया, ये महलों, ये तख़्तों, ये ताजों की दुनिया, ये इनसां के दुश्मन समाजों की दुनिया, ये दौलत के भूखे रिवाज़ों की दुनिया, ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है। आप इस गाने के बोल सुन कर ही जान जायेंगे कि प्यासा फिल्म आपको किन चीजों से रूबरू करवाएगी। एक कवि जिसे भाइयों ने नौकरी होने की वजह से घर से निकाल दिया है, एक प्रेमिका जिसकी नजर में शादी करने के लिए प्रेम से बढ़ कर पैसा और शौहरत है। गौर करने वाली बात तो ये है कि उस कवि को अपनी काबिलियत साबित करने का एक मौका प्रेमिका से लेकर भाई और दुनिया-समाज कोई नहीं देता। 

प्यासा में कवि विजय का किरदार निभाया है गुरु दत्त ने, जो असल जिंदगी में नींद आने की बीमारी से पीड़ित थे। विजय एक मंझे हुए कवि हैं, लेकिन नए होने के कारण कोई भी प्रकाशक उनकी किताब छापने को तैयार नहीं हैं। किताबें छापने से मना करने के साथ ही प्रकाशक उनकी नज्मों को खराब कहते हैं। कई जगहों से इंकार किये जाने के बाद भी विजय को अपनी नज्मों पर पूरा भरोसा है। वो कहते हैं कि बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद, ये कहावत फिल्म में भी दोहराई गई है। विजय के भाई उसकी लिखी गई नज्मों को दस रुपए में रद्दी में बेच देते हैं। वह बहुत दुखी होता है। रद्दी की दुकान से उसे गुलाबो नाम की तवायफ ले जाती है। विजय उसे ढूंढते-ढूंढते गुलाबो तक पहुँच जाता है, लेकिन गुलाबो उसे बेदौलत पाकर उसकी बातों पर ध्यान नहीं देती। जब उसे पता चलता है कि वो वही शायर है, जिसकी नज्में उसके पास है, तब उसे गुनाहगार जैसा महसूस होता है।  

विजय अपनी किताब छपवाने के साथ ही नौकरी की तलाश में है, उसे स्थायी काम नहीं मिलता तो वह छोटे-मोटे काम कर खाने के पैसे जुटाता। वह कई दिनों तक भूखा रहता। एक दिन वह किसी आदमी का सामान रखवाने में उसकी मदद करता है, वह आदमी उसके हाथ में किताबें देख कर प्रतिक्रिया देता है कि पढ़े-लिखे लोग भी अब कुली का काम करने लग गए और काम के बाद उसे सिक्का देता है। सिक्का पाते ही विजय खाने के लिए होटल चला जाता है, जहां होटल का मालिक उसकी बेइज्जती कर उसे पुराना बकाया भरने को भी कहता है। विजय उसे वही सिक्का देता है। जब होटल मालिक उसे सिक्के के खोटे होने की बात कहने के साथ दुत्कारता है तो विजय में सोच में डूब जाता है। विजय के मन में उस व्यक्ति का दोगलापन होने के ख्याल चलते रहते हैं। इतने में गुलाबो उसी खाने के पैसे भर देती है। विजय उसे कहता है, मुझपे तरस मत खाओ। गुलाबो इस पर जवाब देती हैतुम पहले ऐसे इंसान हो जिसने मेरा एहतराम (सम्मान) किया।  
Guru Dutt


विजय की नौकरी लग जाती है और अपनी ही प्रेमिका मीना के कारण नौकरी गंवानी पड़ती है। मीना का पति प्रकाशक श्रीमान घोष है। इन्हीं दिनों विजय को अपनी माँ की मौत की खबर मिलती है तो वह टूट जाता है। विजय के मन में इतनी इंसानियत होती है कि आत्महत्या करने जाने से पहले वह ठंड से तड़प रहे भिखारी को अपना कोट दे देता है। विजय पटरियों की तरफ आगे बढ़ता है कि उसकी मंशा देख कर वह भिखारी भी उसके पीछे जाने लगता है। विजय को बचाने के एवज में उस भिखारी की जान चली जाती है। उस कोट और कोट में रखी नज्मों से लोग उसे विजय समझ कर मृत घोषित कर देते हैं।   

विजय के जाने के बाद गुलाबो बहुत टूट जाती है। वह प्रकाशक घोष के पास विजय की नज्में छपवाने जाती है, लेकिन उसे वहां मीना मिल जाती है। मीना अपने पति की नजरों से उन नज्मों को बचाने के लिए गुलाबो से उसे बेचने के लिए कहती है और उसे छापने से इंकार कर देती है। गुलाबो मुंहमांगी कीमत दिए जाने के बाद भी हाँ नहीं करती तब मीना उससे पूछती है कि तुम पैसे के लिए अपना सब कुछ बेचती हो तो फिर ये नज्में क्यों नहीं। गुलाबो उसे जवाब देती है कि मैं अपना जिस्म बेचती हूँ रूह नहीं। जैसे-तैसे वो विजय कि नज्मे छपवा देती है। हंगामा तब होता है जब विजय की नज्मों से खूब पैसा कमाने के बाद घोष को विजय के जिन्दा होने की खबर मिलती है। 
 
Waheeda Rehman

फिल्म की कहानी अच्छी है, स्क्रीनप्ले में कही भी कमी नहीं है। यह फिल्म एक इंसान के विचारों का सफर है, जो आखिर में मंजिल तक पहुँचता है, और उसे ये कहता है कि इस समाज से इतनी दूर जाओ, जहाँ से कहीं और दूर जाने की जरूरत  पड़े। समाज में असहाय का शोषण, इंसान की इंसानियत खत्म होने, भाई-भाई का होने जैसे हालातों को देख कर विजय का मन व्यथित हो जाता है। इसी फिल्म में एक गाना है जिसे मोहम्मद रफी ने गया है, ये पुरपेच गलियाँ, ये बदनाम बाज़ार, ये ग़ुमनाम राही, ये सिक्कों की झन्कार, ये इस्मत के सौदे, ये सौदों पे तकरार, जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं, मदद चाहती है ये हौवा की बेटी, यशोदा की हमजिंस, राधा की बेटी, पयम्बर की उम्मत, ज़ुलयखां की बेटी, जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं, ये ढलके बदन और ये बीमार चेहरे,जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं। इस गाने के जरिए आप पूरी फिल्म की कहानी को समझ सकते है।


फिल्म का निर्देशन गुरु दत्त ने किया है। अभिनय के साथ निर्देशन में भी कही कोई कमी नहीं दिखाई देती। गुरु दत्त आँखों से बात करते नजर आते हैं। फिल्म में कई दृश्य यादगार है। प्यासा की कहानी अबरार अल्वी ने लिखी है। उन्होंने गुलाबो का किरदार असल जिंदगी की एक महिला से प्रेरित होकर लिखा था। फिल्म में कई दृश्य अलग-अलग एंगल से फिल्माए गए हैं। 
वहीदा रहमान की यह मुख्य किरदार वाली पहली फिल्म थी। वहीदा रहमान ने दमदार अभिनय किया है। सांवरिया फिल्म में सोनम कपूर का लुक प्यासा फिल्म की वहीदा से मिलता जुलता बताया है फिल्म में गुरु दत्त और वहीदा रहमान की केमिस्ट्री भी अच्छी लगी। कुल मिलकर इतना ही कि फिल्म देखने लायक है। ये फिल्म देख कर आप भी समाज के खोखलेपन और दोगलेपन को लेकर कुछ पल तो मंथन जरूर करेंगे।

शुक्राणु: फिजूल में घायल हुए आत्मसम्मान की कहानी


3 comments: