Saturday, May 23, 2020

चलती का नाम गाड़ी: एक लड़की भीगी भागी सी

Madhubala
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एक लड़की भीगी भागी सी, सोती रातों में जागी सी, मिली इक अजनबी से, कोई आगे ना पीछे, तुम ही कहो ये कोई बात है, किशोर कुमार द्वारा गया ये गाना मधुबाला का ख्याल मन में ला देता है। चलती का नाम गाड़ी का यह गाना आज भी मशहूर है। कम इंस्ट्रूमेंट के संगीत के बाद भी ये गाना दिल को लुभाता और गुदगुदाता है। 1958 में रिलीज हुई इस फिल्म को लेकर किशोर कुमार को लगा था कि फिल्म ज्यादा नहीं चलेगी लेकिन हुआ इसके उलट, फिल्म लोगों को पसंद आने के साथ ही कमर्शियली भी कामयाब हुई। इस फिल्म में किशोर कुमार और उनके दोनों भाई अशोक कुमार और अनूप कुमार ने भी काम किया है।


चलती का नाम गाड़ी की कहानी तीन भाइयों के इर्द गिर्द घूमती है। ये तीनो भाई मैकेनिक है। बड़ा भाई ब्रजमोहन शर्मा (अशोक कुमार) महिलाओं से नफरत करता है और अपने छोटे भाई जगमोहन शर्मा "जग्गू" (अनूप कुमार), मनमोहन शर्मा "मन्नू" (किशोर कुमार) को भी महिलाओं से दूर रहने की हिदायत देता है। एक रात तेजी बारिश होती है, रेणु (मधुबाला) की गाड़ी खराब हो जाती है।


मन्नू रेणु की गाड़ी ठीक कर देता है, मगर जल्दी-जल्दी में रेणु से गाड़ी ठीक करने के 5 रुपए 12 आने लेना भूल जाता है। ब्रज मन्नू से बहुत नाराज होता है कि लड़की की गाड़ी ठीक कर दी और उसकी मजदूरी भी ली। ब्रज मन्नू को रेणु से पैसे लेने भेजता है। भाई की डांट मिलने के बाद वह रेणु से पैसे लेने के लिए उसकी गाड़ी में बैठ जाता है। रेणु के इंतजार में उसकी वहीं नींद लग जाती है और इधर अनजान रेणु गाड़ी को अपने घर ले जाती है। जब रात के 2 बजे करीब मन्नू की आँखे खुलती है तो वह रेणु के कमरे में उससे पैसे लेने जाता है। इतने में घर के दूसरे सदस्य उसे चोर समझने लगते है, उसे पकड़ने के लिए घर में भागमभाग होती है। रेणु उसे पैसे देने का वादा कर घर से लौटा देती है। इधर मन्नू एक आदमी को खून करते हुए देखता है, लेकिन पुलिस को कुछ नहीं बताता।
Chalti ka Naam Gaadi
Chalti ka Naam Gaadi


इस वाकिए के बाद मन्नू और रेणु की अच्छी खासी दोस्ती हो जाती है। ब्रज को बहुत बुरा लगता है। रेणु के लिए एक अमीर घर से रिश्ता आता है, जब वे इस बारे में मन्नू को कहती है तो मन्नू अमीरी-गरीबी के फर्क के चलते उसे आने वाले जीवन की शुभकामनायें देता है। फिल्म में मोड़ तब आता है, जब मन्नू रेणु को बताता है कि उस रात उसने जिसे खून करते हुए देखा, वो कोई और नहीं बल्कि उसका मंगेतर है।


चलती का नाम गाड़ी की कहानी ठीक है। स्क्रीनप्ले भी ठीक ठाक है। फिल्म की शुरुआत रचनात्मक है। लेकिन फिल्म बीच में रफ्तार खो देती है और दर्शकों को इसे आगे देखने का कोई मकसद नहीं देती। जैसे ही रेणु के मंगेतर की हकीकत पता चलती है, मजे आना शुरू हो जाते है। इसके अलावा मनोरजन करने के लिए अच्छे गाने भी फिल्म का हिस्सा है। बाबू समझो इशारे, पांच रुपैया बारह आनाहाल कैसा है जनाब का, ये गाने आज भी लोगों को पसंद आते हैं।


 सत्येन बोस ने फिल्म का निर्देशन अच्छा किया है। अगर अभिनय की बात की जाए तो अशोक कुमार, किशोर कुमार और मधुबाला ने अच्छा अभिनय किया है, लेकिन याद रखने वाला अभिनय अनूप कुमार ने किया है। अनूप कुमार का अभिनय और किरदार आपको फिल्म की कम रफ्तार में हंसा कर बांधने का काम करता है।  
अंत में सिर्फ इतना कि फिल्म देखी जा सकती है लेकिन ज्यादा कॉमेडी की उम्मीद करे। 


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