Sunday, June 14, 2020

गुलाबो-सिताबो की लड़ाई में तीसरे ने जीती बाज़ी

Gulabo Sitabo film review
Gulabo Sitabo
गुलाबो सिताबो दो कठपुतली हैं जिनका खेल उत्तरपदेश के गांवों में बहुत मशहूर हैं। कलाकार गुलाबो-सिताबो का नाच दिखा कर सास-बहु और भाभी-ननंद के झगड़ो के किस्से सुनाते और अपना गुजारा करते। जूही चतुर्वेदी की लिखी कहानी गुलाबो-सिताबो प्रॉपर्टी एक्ट के केस को रचनात्मक तरीके से बयां करती है। गुलाबो सिताबो फिल्म में एक गुलाबो है और एक सिताबो यानी कि मिर्जा (अमिताभ बच्चन)और बांके (आयुष्मान खुराना। दोनों ही लड़ते रहते हैं। मामला 100-200 साल पुरानी शाही फातिमा महल से जुड़ा बताया हैं। मिर्जा अपनी बेगम के साथ उसके फातिमा महल में रहता है। वह 78 साल का है, जबकि बेगम 94 की है। मिर्जा की नजर शुरू से ही बेगम के फातिमा महल पर है। दूसरी तरफ उनके महल में 70 सालों से रहने वाले किरायेदार भी महल हड़पने की फ़िराक में हैं। महल टूट-फुट रहा है लेकिन कोई मरम्मत नहीं करवाता। दूसरी तरफ किरायेदार 30 रुपए किराया तक समय पर नहीं देते। मिर्जा और बांके दोनों जब देखो तब लड़ते रहते। वह दोनों महल हड़पना चाहते हैं, जबकि महल बेगम के नाम पर है। बांके आटा-चक्की चलाता है, लेकिन समय पर किराया नहीं देता।


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मिर्जा का दोस्त उसे वकील के पास जाने को कहता है। वहाँ वकील उसे कहता है कि ऑनरशिप अपने नाम करवाएं, बचे हुए रिश्तेदारों से NOC लें ताकि बेगम के जाने के महल को लेके कोई दावे नहीं करें। इधर बांके पुरातत्व विभाग कर्मचारी ज्ञानेश को महल से जुड़ी जानकारी देता है ताकि उस महल को खाली करवा लिया जाए और मुआवजे के तौर पर उन्हें रहने के लिए जगह मिल जाएं। इधर मिर्जा का वकील उसे समझाता है कि तुम नहीं निपट सकोगे पुरातत्व विभाग से, इसलिए उसे एक बिल्डर को बेच दें। मिर्जा पैसे के लालच में हाँ कर देता है। अब देखना ये है कि गुलाबो और सिताबो की लड़ाई में जीत किसकी होगी ?

फिल्म की कहानी ठीक है। शूजित सिरकार की कामयाबी है कि वह बूढ़े इंसान के किरदार को बेहतर तरीके से दिखाते हैं। उनका निर्देशन भी कामयाब रहा है, लेकिन बांके के किरदार में आयुष्मान खुराना कुछ जमे नहीं। हालाँकि आयुष्मान अच्छे एक्टर हैं लेकिन ये किरदार उन पर कुछ जमा नहीं। ऐसा लगता है जैसे ये किरदार स्वर्गीय इरफ़ान खान के लिए था, वो ही इस किरदार के साथ न्याय कर पाते, जिससे दर्शकों का मनोरंजन भी हो पाता। इस बारे में शूजित भी कहते हैं कि वो इरफ़ान को इस किरदार के लिए लेना चाहते थे। कहानी से और मनोरंजन की उम्मीद थी, जो मिली नहीं। निर्देशन अच्छा है।
कहानी के लिहाज से संगीत और गाने अच्छे हैं। सेट और लोकेशन कहानी पर खूब जँचे हैं।
अमिताभ बच्चन में गजब की एक्टिंग है, इसका श्रेय शुजीत के निर्देशन को भी जाता है। फर्रुख जफ़र ने फातिमा बेगम के किरदार में अपनी आवाज का असर छोड़ा है। विजय राज और सृष्टि श्रीवास्तव ने भी बेहतर अभिनय किया हैं। अंत में सिर्फ इतना ही कि फिल्म देखी जा सकती है, लेकिन फिल्म देख कर आप सिर्फ इरफ़ान खान को मिस करेंगे।

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