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| Gulabo Sitabo |
बदला लेना तो बनता है बॉस: ब्लैकमेल
मिर्जा का दोस्त उसे वकील के पास जाने को कहता है। वहाँ वकील उसे कहता है कि ऑनरशिप अपने नाम करवाएं, बचे हुए रिश्तेदारों से NOC लें ताकि बेगम के जाने के महल को लेके कोई दावे नहीं करें। इधर बांके पुरातत्व विभाग कर्मचारी ज्ञानेश को महल से जुड़ी जानकारी देता है ताकि उस महल को खाली करवा लिया जाए और मुआवजे के तौर पर उन्हें रहने के लिए जगह मिल जाएं। इधर मिर्जा का वकील उसे समझाता है कि तुम नहीं निपट सकोगे पुरातत्व विभाग से, इसलिए उसे एक बिल्डर को बेच दें। मिर्जा पैसे के लालच में हाँ कर देता है। अब देखना ये है कि गुलाबो और सिताबो की लड़ाई में जीत किसकी होगी ?
फिल्म की कहानी ठीक है। शूजित सिरकार की कामयाबी है कि वह बूढ़े इंसान के किरदार को बेहतर तरीके से दिखाते हैं। उनका निर्देशन भी कामयाब रहा है, लेकिन बांके के किरदार में आयुष्मान खुराना कुछ जमे नहीं। हालाँकि आयुष्मान अच्छे एक्टर हैं लेकिन ये किरदार उन पर कुछ जमा नहीं। ऐसा लगता है जैसे ये किरदार स्वर्गीय इरफ़ान खान के लिए था, वो ही इस किरदार के साथ न्याय कर पाते, जिससे दर्शकों का मनोरंजन भी हो पाता। इस बारे में शूजित भी कहते हैं कि वो इरफ़ान को इस किरदार के लिए लेना चाहते थे। कहानी से और मनोरंजन की उम्मीद थी, जो मिली नहीं। निर्देशन अच्छा है।
कहानी के लिहाज से संगीत और गाने अच्छे हैं। सेट और लोकेशन कहानी पर खूब जँचे हैं।
अमिताभ बच्चन में गजब की एक्टिंग है, इसका श्रेय शुजीत के निर्देशन को भी जाता है। फर्रुख जफ़र ने फातिमा बेगम के किरदार में अपनी आवाज का असर छोड़ा है। विजय राज और सृष्टि श्रीवास्तव ने भी बेहतर अभिनय किया हैं। अंत में सिर्फ इतना ही कि फिल्म देखी जा सकती है, लेकिन फिल्म देख कर आप सिर्फ इरफ़ान खान को मिस करेंगे।

Nice
ReplyDeletethank u
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