Friday, June 19, 2020

कभी आर कभी पार लागा तीरे नज़र

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Aar Paar
गुरु दत्त ने अपनी फिल्मों की कहानी, निर्देशन और चरित्र चित्रण इस तरह दिखाएं, जो आज के समय में भी फिट होते हैं। गुरु दत्त की फिल्मों को देख कर कही से कही तक नहीं लगेगा कि यह पुराने समय में बनाई गई फिल्में हैं। उनकी शैली आधुनिक जमाने के युवाओं का प्रतिनिधित्व करती है। गुरु दत्त अभिनीत और निर्देशित आर पार 1954 में रिलीज हुई।

कालू (गुरु दत्त) अपने मालिक की टैक्सी चलाता है। एक दिन उससे अनजाने में एक्सीडेंट हो जाता है। टैक्सी मालिक की मदद न मिलने पर उसे छह महीने की सजा काटने जेल जाना पड़ता है। अच्छे बर्ताव के कारण उसकी दो महीने की सज़ा माफ़ कर दी जाती है। जेल से छूटने के बाद वह अपने साथ रह रहे कैदी का संदेश एक होटल मालिक को पहुँचाने जाता है। दूसरी और पुराना मालिक उसे काम पर नहीं रखता। वह गैरेज में मैकेनिक का काम करने लगता है, वहीं मालिक की बेटी निक्की (श्यामा) से प्यार करने लगता है। अपनी बेटी के साथ रोमेंस करते हुए निक्की के पिता लालाजी (जगदीप सेठी) उसे काम से निकाल देते हैं। उन्हें पता चलता है कि कालू सजायाफ्ता है तब उन्हें ये शक होता है कि वह चोर और कातिल है। इसलिए वह निक्की को कालू से दूर रहने को कह देते हैं। कालू उस होटल मालिक को संदेशा देता है। वह होटल मालिक उसे टैक्सी खरीद कर दे देता है और उसके सामने शर्त रखता है कि हमें पैसे नहीं चाहिए, लेकिन हम जब बोलेगे तुम्हें तब हमें गाड़ी से लेकर चलना होगा। सब बातों से अनजान कालू उसे हाँ कर देता है। इधर लालाजी और कालू की लड़ाई में निक्की बीच में फंसी होती है। कालू निक्की को कह देता है कि आज आर या पार हो जाए, वह उसका रात 11 बजे इंतजार करेगा। अगर वह आई तो ठीक है, अगर वह नहीं आई तो वे दोनों कभी नहीं मिलेंगे। 
इधर कालू को होटल मालिक और उसके लोगों को लेकर जानकारी मिलती है कि वे बैंक लूटने वाले हैं। इसलिए वह उनका साथ छोड़ देता है। होटल मालिक निक्की को किडनेप कर लेता है ताकि वह कालू से अपना काम निकलवा सकें। अब आगे क्या होगा, ये तो आपको ही देखना पड़ेगा।

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बहरहाल फिल्म कोई कॉमेडी शैली की नहीं है, फिर भी कई सीन में आपको हंसी आएगी। कहानी अबरार अल्वी ने लिखी है, जो कि बिलकुल बेसिक है। बहुत ज्यादा खास तो नहीं लेकिन निर्देशन और स्क्रीनप्ले इसे देखने लायक बनाते हैं।
सिनेमाटोग्राफी अच्छी है, हालाँकि कहानी में और ज्यादा बेहतर सिनेमाटोग्राफी का कोई स्कोप नहीं था।
संगीत ओ पी नय्यर का है। इस फिल्म के दो गाने तो आज भी लोगों को याद है, कभी आर कभी पार लगा तीरे नजर, बाबूजी धीरे चलना जैसे गानों ने फिल्म को और मनोजरंक बनाया है।
गुरु दत्त ने फिल्म का निर्देशन बहुत अच्छा किया है, उनके निर्देशन ने फिल्म को देखने लायक ही नहीं तारीफें काबिल भी बनाया है।
अगर अभिनय की बात करें तो जगदीप सेठी ने कम सीन में अच्छा असर छोड़ा है। श्यामा, गुरु दत्त, जॉनी वॉकर, शकीला ने अच्छा अभिनय किया है। जगदीप ने इलायची के रोल में हंसाया है।
फिल्म देखने और दिखाने लायक है। कुल मिलाकर फिल्म मनोरंजक है।

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